Saturday, August 14, 2010

सन ४७ से




धुनी कपास की बनी

पोनी को चरखे पर कात

बनाई थी खादी की

एक सफेद चादर

कुछ चूहे मिलकर

कुतरते रहे रात दिन

उसे सन ४७ से

और आज

छोटी छोटी कतरनों का ढेर

लगने लगा है जैसे

कच्ची कपास

उसे धुनना होगा

एक नई चादर

फिर से बुनना होगा.


*

-स्वतंत्रता दिवस की बधाई और शुभकामनायें-

Sunday, July 18, 2010

पतन


एक बार
बस
एक बार

कुछ ढीला
छोड़ दिया था
खुद को..

गिरी......

और फिर

पतन
की
कोई सीमा न रही!!!

Sunday, July 4, 2010

भ्रूण हत्या!!

नहीं चाहिये मुझे

तुम्हारी बराबरी का दर्जा

नहीं चाहिये मुझे

कोई सम्मान

नहीं चाहिये मुझे

रुपया पैसा...

मगर

मुझे इन सब के बदले

बस

और केवल

बस

जीने का अधिकार दे दो!!

मुझे मेरा परिवार दे दो!!

Monday, December 7, 2009

एक रिक्तता

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टूटा

जो यह

विश्वास का धागा..

फिर जुड़ेगा नहीं..

और

एक रिक्तता

सालती रहेगी जीवन भर....

तुम्हें भी

और

मुझे भी!!!

Tuesday, October 20, 2009

घी का दीपक..


इस दीपावली

एक घी का दीपक

छत की

उस मुंडेर पर भी रखा..

जहाँ आकर

तुम्हारी यादें

मुझसे मिला करती थी..

मेरे जीवन को

रोशन किया करती थी..

शायद दीपक की रोशनी

उन यादों को

भटकी राह दिखाये...

एक उम्मीद बाकी है अभी!!

Wednesday, September 23, 2009

तू

चमन से आती हवाओं में
तेरी छुअन का
अहसास है...

दूर रह कर भी
तू कितनी
पास है...

Thursday, January 15, 2009

किसका विश्वास करुँ?

किसका विश्वास करुँ?
तुम्हारा ?
मगर
तुम!!
तुम तो मेरे अपने हो...
अपनों पर अब
कौन
विश्वास करता है...
अपनों से ही तो
मानव डरता है.