शेर इंकलाबी वो पढ़ते रहे..
मंच पर से वो ही गरजते रहे...
वो भी डरते रहे..और
हम भी डरते रहे...
यह व्यथा है..हमारी..
हम किससे कहें???.
Tuesday, April 29, 2008
Thursday, February 28, 2008
आखिर क्यूँ??
आखिर क्यूँ??
आखिर क्यूँ यह अहसास है
जब से उसने मुझे देखा
वो यहीं कहीं
मेरे आस पास है....
मैं जानती हूँ कि
वो मेरा हो नहीं सकता..
उसकी अपनी एक दुनिया है
जिसे वो खो नहीं सकता...
मगर फिर भी
न जाने क्यूँ...
आखिर क्यूँ यह अहसास है
जब से उसने मुझे देखा
वो यहीं कहीं
मेरे आस पास है....
आखिर क्यूँ यह अहसास है
जब से उसने मुझे देखा
वो यहीं कहीं
मेरे आस पास है....
मैं जानती हूँ कि
वो मेरा हो नहीं सकता..
उसकी अपनी एक दुनिया है
जिसे वो खो नहीं सकता...
मगर फिर भी
न जाने क्यूँ...
आखिर क्यूँ यह अहसास है
जब से उसने मुझे देखा
वो यहीं कहीं
मेरे आस पास है....
Tuesday, February 19, 2008
मेरी पनीली आँखें…
कभी कुछ ख्वाब पलते थे
मेरी इन पनीली आँखों में.
डूब कर वो उतरता था…
खो जाता था दूर…
कहीं बहुत गहरे..
मैं डर जाती..
वो हंस देता
मैं रो देती..
आँसूओं के संग संग
मानो वो भी निकल आता
मेरे आँसू पोंछता
प्यार से गाल थपथपाता
और कहता, ‘ऐ पगली’
एकाएक जाने कहाँ
खो गया वो…
किस मोड़ पर साथ मेरा
छोड़ गया वो…
तब से मेरी दुनिया
बंद है इस चारदिवारी में..
अब वो नहीं कहता
मगर सारी दुनिया मुझसे
कहती है, ‘ऐ पगली’
कोई मुझे इस
पागलखाने की कैद से आजाद करा दे..
फिर नहीं देखूँगी कोई ख्वाब..
यूँ भी रो रो कर
सुखा दिये हैं मैंने अपने आँसू
मेरी आँखें भी अब
पनीली न रहीं……
मेरी इन पनीली आँखों में.
डूब कर वो उतरता था…
खो जाता था दूर…
कहीं बहुत गहरे..
मैं डर जाती..
वो हंस देता
मैं रो देती..
आँसूओं के संग संग
मानो वो भी निकल आता
मेरे आँसू पोंछता
प्यार से गाल थपथपाता
और कहता, ‘ऐ पगली’
एकाएक जाने कहाँ
खो गया वो…
किस मोड़ पर साथ मेरा
छोड़ गया वो…
तब से मेरी दुनिया
बंद है इस चारदिवारी में..
अब वो नहीं कहता
मगर सारी दुनिया मुझसे
कहती है, ‘ऐ पगली’
कोई मुझे इस
पागलखाने की कैद से आजाद करा दे..
फिर नहीं देखूँगी कोई ख्वाब..
यूँ भी रो रो कर
सुखा दिये हैं मैंने अपने आँसू
मेरी आँखें भी अब
पनीली न रहीं……
Saturday, October 20, 2007
तुम्हारे बोल
तिलमिला जाता हूँ मैं
हद कर देती हो
क्या शर्तों पर जीवन जीने लगूँ
या मान लूँ कि
मेरा कोई अस्तित्व नहीं,
बिन तुम्हारी सहमति के
क्या चाहती हो तुम
मैं कहता हूँ वो तुम मानती नहीं
तुम कहती हो कि तुम जानती नहीं
कोई तो रास्ता होगा.....
सोचो न!!!
बताओ न!!!
मैं जीना चाहता हूँ-
अपनी शर्तों पर.
हद कर देती हो
क्या शर्तों पर जीवन जीने लगूँ
या मान लूँ कि
मेरा कोई अस्तित्व नहीं,
बिन तुम्हारी सहमति के
क्या चाहती हो तुम
मैं कहता हूँ वो तुम मानती नहीं
तुम कहती हो कि तुम जानती नहीं
कोई तो रास्ता होगा.....
सोचो न!!!
बताओ न!!!
मैं जीना चाहता हूँ-
अपनी शर्तों पर.
Friday, October 5, 2007
जिन्दगी और मौत
मौत!!
आज कुछ इतने करीब से गुजरी
जिन्दगी!!
एक पल को ठिठकी
सहमी, भरमाई,
फिर हाथ थाम कर मेरा
ले चली अपने साथ.
एक नया साहस, एक नया अंदाज.
अब तो सब कुछ देखा
सब कुछ जाना पहचाना सा है.
अब मुझे मौत से डर नहीं लगता!!
आज कुछ इतने करीब से गुजरी
जिन्दगी!!
एक पल को ठिठकी
सहमी, भरमाई,
फिर हाथ थाम कर मेरा
ले चली अपने साथ.
एक नया साहस, एक नया अंदाज.
अब तो सब कुछ देखा
सब कुछ जाना पहचाना सा है.
अब मुझे मौत से डर नहीं लगता!!
Monday, June 25, 2007
मेरा चिन्तन
मेरा चिन्तन
मानस के अंतःपटल पर
पर उठते चिन्तन
मैं कौन हूँ?
मैं कहाँ हूँ?
मैं क्या हूँ?
से परे
सतही चिन्तन के पार
एक अस्तित्व का प्रश्न
क्या मैं हूँ?
Tuesday, June 19, 2007
मैं मुक्त हो गई
मन भटका था. तब मैं १७ साल की थी. घर पर माँ, पिता जी और एक छोटा भाई था. हम गाँव मे रहते थे. घर में यूँ तो कोई आभाव नहीं था मगर अथाह भी नहीं था. ग्रमीण परिवेश में शायद लड़कियाँ देर से बड़ी होती हैं. जो कुछ शहर की लड़कियाँ १०-१२ साल की उम्र में जान जाती है, गाँव की लड़कियाँ उसी बात को १६-१७ वर्ष की आयु में भी ठीक ठीक नहीं समझ पाती.
हमारे पड़ोस में रहने वाले मिश्रा जी, जो कि गाँव के प्रधान भी थे, का लड़का योगेश बम्बई में रहकर उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहा था. शायद उस वक्त वो २०-२१ साल का रहा होगा. छुट्टियों में घर आता था. शहरी राग रंग, पिता के पैसों का रोब, शहर के तौर तरीके. वो मुझे बहुत आकर्षित करता था. कभी मैने उससे बात नहीं की और न ही उसने मुझसे. दिखने में, जैसा की लोग बताते हैं, मैं भी काफी सुंदर हूँ. बस कभी खिड़की से और कभी छत से उसे देखा करती थी. उसके गाँव आने का इन्तजार भी रहता था.
कब उसकी शादी हो गई. फिर मेरी भी शादी हो गई थी. बहुत समय तक उस आकर्षण से मुक्त नहीं हो पाई. जीवन के किस किस दौर से गुजरी मगर वो आकर्षण की गठान कभी कमजोर नहीं पड़ी. हमेशा मुझ पर हावी रहती.
हिमालय में किसी अद्वितीय अदृश्य शक्ति ने मेरी मदद की और मैं मुक्त हो गई. कितना हल्का महसूस किया था उस रोज मैने. मुझे लगता है न जाने कितने ही लोग इस तरह की कुछ गांठे अपने साथ लिये पूरा जीवन गुजार देते हैं. आत्मा पर एक बोझ लिये इस दुनिया से चले जाते हैं.
हमारे पड़ोस में रहने वाले मिश्रा जी, जो कि गाँव के प्रधान भी थे, का लड़का योगेश बम्बई में रहकर उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहा था. शायद उस वक्त वो २०-२१ साल का रहा होगा. छुट्टियों में घर आता था. शहरी राग रंग, पिता के पैसों का रोब, शहर के तौर तरीके. वो मुझे बहुत आकर्षित करता था. कभी मैने उससे बात नहीं की और न ही उसने मुझसे. दिखने में, जैसा की लोग बताते हैं, मैं भी काफी सुंदर हूँ. बस कभी खिड़की से और कभी छत से उसे देखा करती थी. उसके गाँव आने का इन्तजार भी रहता था.
कब उसकी शादी हो गई. फिर मेरी भी शादी हो गई थी. बहुत समय तक उस आकर्षण से मुक्त नहीं हो पाई. जीवन के किस किस दौर से गुजरी मगर वो आकर्षण की गठान कभी कमजोर नहीं पड़ी. हमेशा मुझ पर हावी रहती.
हिमालय में किसी अद्वितीय अदृश्य शक्ति ने मेरी मदद की और मैं मुक्त हो गई. कितना हल्का महसूस किया था उस रोज मैने. मुझे लगता है न जाने कितने ही लोग इस तरह की कुछ गांठे अपने साथ लिये पूरा जीवन गुजार देते हैं. आत्मा पर एक बोझ लिये इस दुनिया से चले जाते हैं.
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