बढ़ती आबादी
की
सहानुभूतिराहित
समवेदनाशून्य प्रवृतियाँ,
विषम सामाजिक परिस्थियाँ
और
सामूहिक भृष्टाचार
क्या यही
अपराधों
एवं
दुष्कर्मों
का
जनक नहीं??
Thursday, July 17, 2008
मोहल्ला और कविता
कुंठा से मन कडुवाया..
शब्दों ने आकार लिया..
ओह!
शायद कविता रच गई..
अब कुछ गोड़ पसार लें..
तम्बाखू खंगार लें..
मोहल्ले के नुक्कड़ वाली
पनवाड़ी की दुकान पर
शाम को बतियायेंगे
इस कविता को सुनायेंगे...
मोहल्ले के तो हम मुन्नु हैं
कौन बूझता है
हमारा कवि वाला नाम?
खुद विवाद उठायेंगे कविता पर..
खूब गाली बकेंगे
दूसरे साथ देंगे..
विवाद और कोहराम होगा..
कवि बदनाम होगा..
कवि और कविता का नाम होगा..
जल्द ही हाथों मे इनाम होगा!!
शब्दों ने आकार लिया..
ओह!
शायद कविता रच गई..
अब कुछ गोड़ पसार लें..
तम्बाखू खंगार लें..
मोहल्ले के नुक्कड़ वाली
पनवाड़ी की दुकान पर
शाम को बतियायेंगे
इस कविता को सुनायेंगे...
मोहल्ले के तो हम मुन्नु हैं
कौन बूझता है
हमारा कवि वाला नाम?
खुद विवाद उठायेंगे कविता पर..
खूब गाली बकेंगे
दूसरे साथ देंगे..
विवाद और कोहराम होगा..
कवि बदनाम होगा..
कवि और कविता का नाम होगा..
जल्द ही हाथों मे इनाम होगा!!
Wednesday, July 16, 2008
हाय!! मेरा भारत महान!
एक दूसरे को पीछे खींचते...
एक दूसरे को नीचे दिखाते...
दूसरों को दुखी देख
खुशी मनाते लोग...
नज़र से बचने चुपचाप
खुशी मनाते लोग...
अपने से ज्यादा
दूसरों मे तल्लीन..
सामने वाले की
सफलता पर गमगीन..
आपस में परेशान
कुंठा में
धरती को बनाते पीकदान...
एक आँख बँद किये
सोने में भी नाहक हैरान..
दोनों आँखों का बंद होना
याने
अब ठौर है शमशान...
हाय!! मेरा भारत महान!
एक दूसरे को नीचे दिखाते...
दूसरों को दुखी देख
खुशी मनाते लोग...
नज़र से बचने चुपचाप
खुशी मनाते लोग...
अपने से ज्यादा
दूसरों मे तल्लीन..
सामने वाले की
सफलता पर गमगीन..
आपस में परेशान
कुंठा में
धरती को बनाते पीकदान...
एक आँख बँद किये
सोने में भी नाहक हैरान..
दोनों आँखों का बंद होना
याने
अब ठौर है शमशान...
हाय!! मेरा भारत महान!
Tuesday, June 3, 2008
अभिव्यक्त करुँ या मौन धरुँ
अभिव्यक्त करुँ
या मौन धरुँ
कब कोई
यहाँ पर सुनता है
मेरे सब
सुख दुख मेरे हैं
कैसे माने
हम तेरे हैं
पर पीड़ा से
विचलित होकर
कब कोई
यहाँ सर धुनता है
कब कौन
किसी का होता है
क्यूँ जहर
यहाँ पर बोता है.
अपनी दुनिया में
खुश हो लेंगे
बस ख्वाब
यहाँ वो बुनता है
या मौन धरुँ
कब कोई
यहाँ पर सुनता है
मेरे सब
सुख दुख मेरे हैं
कैसे माने
हम तेरे हैं
पर पीड़ा से
विचलित होकर
कब कोई
यहाँ सर धुनता है
कब कौन
किसी का होता है
क्यूँ जहर
यहाँ पर बोता है.
अपनी दुनिया में
खुश हो लेंगे
बस ख्वाब
यहाँ वो बुनता है
Monday, May 26, 2008
खुदकुशी
जिन्दगी के खेल में
शतरंज की बिसात पर
यूँ भी
किसी को मात
किसी को शाह
फिर
क्या सोच कर
की
तुमने
खुदकुशी.
शतरंज की बिसात पर
यूँ भी
किसी को मात
किसी को शाह
फिर
क्या सोच कर
की
तुमने
खुदकुशी.
Friday, May 2, 2008
डर
सुबह सुबह
आँजुरी में अपने
चमकती धूप लिए
अँधेरी रात की गली के
मुहाने पर आकर
ठिठकी खड़ी है-
शायद...
मेरी आँखों की नमीं से
वो भी डरी है.
आँजुरी में अपने
चमकती धूप लिए
अँधेरी रात की गली के
मुहाने पर आकर
ठिठकी खड़ी है-
शायद...
मेरी आँखों की नमीं से
वो भी डरी है.
Tuesday, April 29, 2008
हम किससे कहें?
शेर इंकलाबी वो पढ़ते रहे..
मंच पर से वो ही गरजते रहे...
वो भी डरते रहे..और
हम भी डरते रहे...
यह व्यथा है..हमारी..
हम किससे कहें???.
मंच पर से वो ही गरजते रहे...
वो भी डरते रहे..और
हम भी डरते रहे...
यह व्यथा है..हमारी..
हम किससे कहें???.
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