Thursday, January 15, 2009

किसका विश्वास करुँ?

किसका विश्वास करुँ?
तुम्हारा ?
मगर
तुम!!
तुम तो मेरे अपने हो...
अपनों पर अब
कौन
विश्वास करता है...
अपनों से ही तो
मानव डरता है.

Wednesday, October 8, 2008

चिर मौन!!

बेखौफ
वैभवशाली
किन्तु
गंभीर और मौन...
तन पर
अरमानी का मँहगा सूट
और
उनसे उठती
फ्रांसीसी परफ्यूम की
उत्तेजक महक
की अनकही आवाज!!
सबने सुनी
सबने गुनी
सब साथ हो लिए....

घबरा हुआ वो
आँख में आसूं लिए
बदबूदार
चिथड़ों में लिपटा
भूख से परेशान
दो रोटी के लिए
चीख चीख कर
आवाज लगता रहा..
न जाने क्यूँ!!

उसकी आवाज
किसी भी कान ने
न सुनी..
या कि सुन कर भी
अनसुनी कर दी!!

वो चिल्लाते चिल्लाते
मौन हो गया..
चिर मौन!!

Tuesday, September 30, 2008

साँस की लूट

दो मुक्तक प्रस्तुत कर रही हूँ.



-१-

लिख रहे हैं जिन्दगी के रुप को
रोज होती सांस की इस लूट को
देखते ही देखते सब चुक गया
ढो रहे हैं हड्डियों के ठूंठ को.

-२-

देखती हूँ रोज अपने राम को
और उसमें ही बसे रहमान को
बांटते हैं धरम के जो नाम पर
क्या सजा दें आज उस शैतान को.



नवरात्रे की मंगलकामनाऐं.

Sunday, September 28, 2008

तय करो किस ओर हो

तय करो किस ओर हो
इस ओर हो, उस ओर हो.

बातों को मनवाना हो तो
तर्कों में कुछ जोर हो.
या फिर
कुछ ऐसा कर जाओ कि
सदियों तक उसका शोर हो.

तय करो किस ओर हो
इस ओर हो, उस ओर हो.

Thursday, August 28, 2008

चिट्ठाकार की टिप्पणी हड़ताल!

दृश्य १:

तहसील कार्यालय में रामाधार तिवारी और श्रीपद पटेल लिपिक पद को शोभायमान करते हैं. उनसे मिलने मैं जब भी किसी काम से तहसील कार्यालय गई, दोनों मुझे अधिकतर कार्यालय के बाहर ही, कभी पान की दुकान पर या कभी चाय की चुस्कियाँ लेते मिले. कम ही ऐसा होता कि मुझे उन्हें मिलने कार्यालय के अंदर तक जाना पड़े.

आज भी हमेशा की तरह ही वो दोनों बाहर ही मिल गये. फरक सिर्फ यह था कि चाय-पान की दुकान के बदले आज वो एक तंबू के नीचे तख्त डाले बैठे थे. पता चला कि किसी बात से नाराज दोनों हड़ताल पर हैं.

मैं तहसीलदार से मिली. उसे उनके हड़ताल के विषय में अधिक जानकारी ही नहीं थी और न ही वो इससे विचलित नजर आया. मैने उनसे आश्चर्य से पूछा भी कि आप जरा भी विचलित नहीं दिखते, काम के हर्जाने की चिंता नहीं है आपको?

वे मुस्कराते हुए कहने लगे कि क्या हर्जाना? वो तो वैसे भी कोई काम नहीं करते थे. कभी कर दिया तो मानिये अहसान हो गया. उल्टा उनके हड़ताल पर चले जाने से बाकी लोगों का काम बिना अड़ंगे के चल रहा है.

मैं तो दंग रह गई ऐसी व्यवस्था की हालत को देखकर.

मगर मेरे दंग रह जाने से क्या अंतर पड़ जाने वाला है, सब वैसा ही चलता रहेगा.

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दृष्य २:

सुना है दो चिट्ठाकार टिप्पणी हड़ताल पर हैं.

मैने एक वरिष्ट चिट्ठाकार से पूछा कि कहानी क्या है?

वो हँसते हुए कहने लगे-क्या कहानी? वही दृष्य १ वाली!!

मैं तो फिर दंग रह गई.
मगर मेरे दंग रह जाने से क्या अंतर पड़ जाने वाला है, सब वैसा ही चलता रहेगा.
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कृप्या बुरा न मानें, यह बस मेरे दिल की बात है. किसी का विरोध नहीं.

Wednesday, August 27, 2008

हाय, ये कैसी विडंबना है!

तू मेरा वर्तमान है..
मैं तुझसे
मूँह चुराती हूँ..
तुझे
देखने को भी
मेरा मन नहीं करता!
और
फिर
खोजने लगती हूँ
तुझमें अपना भविष्य.
सजाने लगती हूँ
नये सपने!
हाय, ये कैसी विडंबना है!

Sunday, August 17, 2008

कौन है और क्या तलाशती है?

वो कुछ बोलती नहीं है.
वो रोती नहीं है.
वो हरदम एकटक बस सामने वाले की
आँख में आँख डाले ताका करती है..
जाने क्या खोजती है
सामने वाले की आँख में वो.

उसकी तलाश का कोतुहल
उसकी आँखों में दिखता है..
एक अजब उदासी,
एक अजब परेशानी,
एक अजब ज़ज्ब तूफान
और एक अनजान तलाश.

चेहरे के भाव-
बस्स इन सब का
मिला जुला सना हुआ रुप.

एक कोण से सुन्दर ममत्व से परिपूर्ण,
एक कोण से विकृत
और एक अन्य से भयावह.

न कुछ बोलना,
न रोना,
न मुस्कराना.
जाने क्या तलाशती है..

सुना है अपना सुनहरा भविष्य ढ़ूढ़ती है.

वो सुनहरा भविष्य-
जिसके सपने उसने ६२ साल पहले देखे थे,
वो सपने जिसे उसी के अंशो ने
छिन्न भिन्न कर दिया.

एक उम्मीद जो कभी नहीं जाती-
वही उसकी आँखो में है
जिनसे वो दूसरों की आँखों में
अपने सपने तलाशती है शायद.

एक अंतहीन तलाश
और
अपनों की मार से
जरजर होती काया!