Friday, August 27, 2010

नाव




कागज़ के टुकड़े को
करीने से
आकार देकर
बहा दी थी
नाव
बारिश के पानी में..
कुछ दूर चली
लड़खड़ाई..
डूबी
और
खो गई
लुग्दी बन कर....
.
.
.
आज भी
बारिश में
मुझे
याद आती है वो
नाव!!

13 comments:

अनूप शुक्ल said...

सुन्दर !

बांधो न नाव इस ठांव बन्धु
देखेगा सारा गांव बन्धु।

"निराला"

मो सम कौन ? said...

खूबसूरत चित्र, खूबसूरत अल्फ़ाज़।
हम सबके अन्दर का बच्चा बचा रहे तो इन्सानियत बची रहेगी।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत भावुक सी और कोमल सी रचना

बी एस पाबला said...

हमें भी याद आती हि वह डगमगाती नाव

राजेश उत्‍साही said...

चूंकि आपने कागज के टुकड़े की नाव नहीं बनाई थी,बल्कि उसे नॉंव दिया था यानी एक नाम दिया था इसलिए वह डूब गया।

रंजना said...

गहरे दिल को छूते भाव ,बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति...
मन मुग्ध कर लिया आपकी इस रचना ने...

RC Mishra said...

कृपया शीर्षक मे नाँव को नाव से बदल दीजिये।
धन्यवाद।

साधवी said...

धन्यवाद श्री राजेश उत्साही जी

धन्यवाद श्री RCMishra जी

भूल सुधार कर दी है.

दिलीप कवठेकर said...

बहुत अच्छा खयाल>>>

M VERMA said...

बहुत खूब
यादें ताज़ा कर दिया आपने तो

मृत्‍युन्‍जय कुमार त्रिपाठी said...

कृपया लिखना मत छोडि़ए, आपकी लेखनी हमें प्रेरणा देती हैं, कभी-कभी तो लगता है कि हमारी कोई बात आप कह रही हैं।
मृत्‍युंजय

सत्यप्रकाश पाण्डेय said...

बहुत सुन्दर कविता,
यहाँ भी पधारें :-
अकेला कलम

'अदा' said...

खूबसूरत चित्र, खूबसूरत अल्फ़ाज़..!