Tuesday, September 30, 2008

साँस की लूट

दो मुक्तक प्रस्तुत कर रही हूँ.



-१-

लिख रहे हैं जिन्दगी के रुप को
रोज होती सांस की इस लूट को
देखते ही देखते सब चुक गया
ढो रहे हैं हड्डियों के ठूंठ को.

-२-

देखती हूँ रोज अपने राम को
और उसमें ही बसे रहमान को
बांटते हैं धरम के जो नाम पर
क्या सजा दें आज उस शैतान को.



नवरात्रे की मंगलकामनाऐं.

4 comments:

डॉ .अनुराग said...

वक़्त बेवक्त ऐसे ही कुछ मुक्तक लिखती रहिये...अच्छा लिखा है.....वैसे ६ महीने में एक बार प्रकट होती है आप ?

मोहन वशिष्‍ठ said...

लिख रहे हैं जिन्दगी के रुप को
रोज होती सांस की इस लूट को
देखते ही देखते सब चुक गया
ढो रहे हैं हड्डियों के ठूंठ को.


-२-

देखती हूँ रोज अपने राम को
और उसमें ही बसे रहमान को
बांटते हैं धरम के जो नाम पर
क्या सजा दें आज उस शैतान को.

साध्‍वी जी क्‍या लिखा हे आपने मेरे पास शब्‍द ही नहीं हैं इन पंक्तियों को नाम देने का बहुत ही अच्‍छा लगा पढकर अनुराग जी ठीक कह रहे हैं थोडा जल्‍दी जल्‍दी आया करो

Arvind Mishra said...

सशक्त अभिव्यक्ति !

संजय तिवारी ’संजू’ said...

achcha prayaas majaa aayaa do rahe hai hadideyu ke thut ko jaladi se kuC nayaa liko