Sunday, July 18, 2010

पतन


एक बार
बस
एक बार

कुछ ढीला
छोड़ दिया था
खुद को..

गिरी......

और फिर

पतन
की
कोई सीमा न रही!!!

6 comments:

अनूप शुक्ल said...

सुन्दर भाव! पतन की बात भी सुन्दर लग सकती है!!

Mishra Pankaj said...

सुन्दर कविता ....
आपके ब्लॉग पर पहली बार आया

संजय तिवारी ’संजू’ said...

bahut sundar kavitaa me aapne apne andar kI bhavnaao ko outraaa he

संजय तिवारी ’संजू’ said...

bahut badhiyy kavitaa hi

शरद कोकास said...

बहुत सुन्दर व्यंजना है ।

M VERMA said...

आरम्भ ही तो परिणति का आगाज़ है
पतन की सीमा भी तो नहीं होती