Friday, October 5, 2007

जिन्दगी और मौत

मौत!!

आज कुछ इतने करीब से गुजरी

जिन्दगी!!

एक पल को ठिठकी
सहमी, भरमाई,
फिर हाथ थाम कर मेरा
ले चली अपने साथ.

एक नया साहस, एक नया अंदाज.

अब तो सब कुछ देखा
सब कुछ जाना पहचाना सा है.

अब मुझे मौत से डर नहीं लगता!!

3 comments:

रवीन्द्र प्रभात said...

आपकी कविता नि:संदेह भावपूर्ण है!

कुमार आशीष said...

सब कुछ जाना पहचाना....
फिर तो स्‍वाभाविक है 'मौत से डर न लगना'
साधुवाद।

Anonymous said...

एक नया साहस, एक नया अंदाज.

अब तो सब कुछ देखा
सब कुछ जाना पहचाना सा है.

अब मुझे मौत से डर नहीं लगता!!
हा हा हा
ये हुई ना बहदुर शेरनी वाली बात !
मौत से कैसा डर ? जो अटल सत्य है उससे क्या डरना!ले जायेगी. ले जाए.
इसे तो हर दिन हर पल याद रखना चाहिए पुण्य करवाए ना करवाए. पाप करने से बचायेगी.इश्वर की उपस्थिति की कल्पना भी शायद इसी लिए की गई है,बड़ी के रास्तों से बचाने के लिए. है ना. तुम तो साध्वी हो,एक सन्यासिनी स्वयं ज्ञानी भी जरूर होंगी,तुम्हे मैं क्या ज्ञान दूँ?