Friday, May 2, 2008

डर

सुबह सुबह
आँजुरी में अपने
चमकती धूप लिए
अँधेरी रात की गली के
मुहाने पर आकर
ठिठकी खड़ी है-
शायद...
मेरी आँखों की नमीं से
वो भी डरी है.

4 comments:

yaksh said...

सुंदर अभिव्यक्ति है...

yaksh said...

सुंदर अभिव्यक्ति है...

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

प्रतीक और बिम्ब का सुंदर प्रयोग है। बधाई स्वीकारें।

सुभाष said...

बहुत सुंदर