Friday, June 15, 2007

मेरा भविष्य




चिंतन की तूलिका से
घोर उदासी के आलम में
अपने मानस पटल को
जीवन का केनवास मान
मैने चंद आड़ी तिरक्षी रेखायें
खींच दी थीं
और अंकित कर दी थीं
अनेकों आकृतियाँ
मेरी बैचनियों के रेखा चित्र..

आज उन्हें बांचकर
वो मेरा भविष्य
बता रहे हैं
मेरी स्व-रचित कुंडली
में छिपे राज
आज बाहर आ रहे हैं.

---क्या मैं खुद को कभी जान पाऊँगी!!

5 comments:

Shastri J C Philip said...

कविता शक्तिशाली है. इसी आशय को कुछ और लम्बी कविता के रूप में प्रस्तुत करें तो और प्रभावी हो जायगा. लिखते रहें.

राकेश खंडेलवाल said...

अब रंग नहीं भर पाता है धुंधले खाकों में चित्रकार
तूलिका कोशिशें करती है, पर विवरण न पाती उभार
खूंटियां पकड़ ढीली करती<. रह रह सलवटें पड़ा करतीं
यों इस जीवन का कैनवास, अक्सर अपूर्ण रह जाता जै

मन है आवारा वनपाखी, अब गीत नहीं गा पाता है.

मानस-मंथन का सटीक प्रयास

Shrish said...

आपका हिन्दी चिट्ठाजगत में स्वागत है। उम्मीद है आप अपने रुचिकर लेखन से परिचित कराती रहेंगी।

साधवी said...

शास्त्री जी, राकेश जी, श्रीश जी.

-आप लोगों का बहुत धन्यवाद. आप सब मेरी प्रार्थना में हैं.

साधवी

कुमार आशीष said...

मेरी स्व-रचित कुंडली
में छिपे राज
आज बाहर आ रहे हैं.
सुन्‍दर।