Tuesday, June 19, 2007

मैं मुक्त हो गई

मन भटका था. तब मैं १७ साल की थी. घर पर माँ, पिता जी और एक छोटा भाई था. हम गाँव मे रहते थे. घर में यूँ तो कोई आभाव नहीं था मगर अथाह भी नहीं था. ग्रमीण परिवेश में शायद लड़कियाँ देर से बड़ी होती हैं. जो कुछ शहर की लड़कियाँ १०-१२ साल की उम्र में जान जाती है, गाँव की लड़कियाँ उसी बात को १६-१७ वर्ष की आयु में भी ठीक ठीक नहीं समझ पाती.

हमारे पड़ोस में रहने वाले मिश्रा जी, जो कि गाँव के प्रधान भी थे, का लड़का योगेश बम्बई में रहकर उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहा था. शायद उस वक्त वो २०-२१ साल का रहा होगा. छुट्टियों में घर आता था. शहरी राग रंग, पिता के पैसों का रोब, शहर के तौर तरीके. वो मुझे बहुत आकर्षित करता था. कभी मैने उससे बात नहीं की और न ही उसने मुझसे. दिखने में, जैसा की लोग बताते हैं, मैं भी काफी सुंदर हूँ. बस कभी खिड़की से और कभी छत से उसे देखा करती थी. उसके गाँव आने का इन्तजार भी रहता था.

कब उसकी शादी हो गई. फिर मेरी भी शादी हो गई थी. बहुत समय तक उस आकर्षण से मुक्त नहीं हो पाई. जीवन के किस किस दौर से गुजरी मगर वो आकर्षण की गठान कभी कमजोर नहीं पड़ी. हमेशा मुझ पर हावी रहती.

हिमालय में किसी अद्वितीय अदृश्य शक्ति ने मेरी मदद की और मैं मुक्त हो गई. कितना हल्का महसूस किया था उस रोज मैने. मुझे लगता है न जाने कितने ही लोग इस तरह की कुछ गांठे अपने साथ लिये पूरा जीवन गुजार देते हैं. आत्मा पर एक बोझ लिये इस दुनिया से चले जाते हैं.

3 comments:

राकेश खंडेलवाल said...

जब जब भौतिकता के बंधन
बांध ह्रदय को इक डोरी में
सीमित कर जाते वितान को
और हमें ऐसा लगता है
अपने मन के न्यायालय में
हम खुद ही अभियुक्त हुए
उस पल जो संगीत प्राण का
गूंज दिशायें दे जाता है
पंछी से पर दे जाता है
उस पल जो स्वर उगे कंठ में
उनको गा कर मुक्त हुए
और ज्ञान से युक्त हुए

Pratik said...

मेरे ख़्याल से आप उस आकर्षण को लेकर अपराध-बोध से ग्रस्त थीं। ग्लानि भाव नहीं होना चाहिए, आकर्षण बना भी रहता तो क्या समस्या थी।

उन्मुक्त said...

जो कल था वह झूट है। जो आज है, अब है वही सत्य।